40 हाथियों के बीच रिपोर्टिंग करने पहुंचे पत्रकारों फंसे...कटघोरा में दहशत की रात...मौके पर नहीं था वन अमला
कोरबा। जिले में हाथियों का आतंक थमने का नाम नहीं ले रहा है। ताजा मामले में कटघोरा वनमण्डल में करीब 40 हाथियों के एक विशाल दल ने दस्तक दी है, जिसने पिछली रात ग्रामीणों के साथ-साथ पत्रकारों की भी जान आफत में डाल दी। शाम से रात भर सभी कोई हाथियों से बचने इधर-उधर भागते रहे पर मजाल है कि मुव्हमेंट क्षेत्र में कोई वन अमला दूर-दूर तक नजर आ जाए। ग्राउंड रिपोर्ट से यह घटना बताने के लिए क़ाफी है कि किस तरह से मैदानी अमला अलर्ट रहता है।दरअसल,कटघोरा वन मण्डल के जटगा रेंज अन्तर्गत कटोरीनगोई के आश्रित मोहल्ला धोबीबारी में दो दिन पहले करीब 40 हाथियों ने 10 घरों को तोड़ा, कुछ पालतू जानवरों की जान ली। निर्धन परिवारों का पूरा सहारा छिन गया और खुले आसमान के नीचे पेड़ की शरण मे जीवन गुजार रहे हैं। हाथियों द्वारा की गई बर्बादी का कवरेज करने कल शुक्रवार को धोबीबारी गए पत्रकार शारदा पाल, नानक सिंह राजपूत, लक्ष्मण महंत व हरीश साहू की भी जान ग्रामीणों के साथ उस वक्त आफत में आई जब हाथियों ने वापसी का एकमात्र रास्ता ब्लॉक कर दिया।अंधेरे में सांसत में फंसी रही जान ये सभी पत्रकार घटना की रिपोर्टिंग करने गांव पहुंचे थे। कटोरीनगोई से पैदल पहाड़ी चढ़कर करीब 5 किलोमीटर पथरीला रास्ता तय करते हुए धोबीबारी दोपहर 1 बजे पहुंचे। तहस-नहस गांव के हालात से रूबरू होने के दौरान ग्रामीणों ने बताया कि वन विभाग वाले आये थे,देखकर लौट गए पर किया-धरा कुछ नहीं। ग्रामीणों के सिर पर न छत न सामान हैं। थोड़ा बहुत अनाज बचा है। रिपोर्टिंग के बाद लौटने की तैयारी थी कि ग्रामीणों ने हाथियों के आने के वक्त का आगाह किया। शाम ढलते ही करीब 7 बजे हाथियों का दल पगडंडी मुख्य मार्ग पर आ गया। इस वक्त भोजन करने बैठे थे कि हाथियों की हलचल ने निवाला भीतर न जाने दिया। खाना खाएं कि जान बचाएं..!चूंकि उस इलाके से निकलने का मात्र एक ही रास्ता है,जिस पर हाथियों की मौजूदगी रही। अंधेरा होने के कारण स्थिति और भी भयावह थी, झींगुरों की सिरसिराहट और पत्तों की सरसराहट सिहरन पैदा कर रही थी। सभी के मोबाइल की बैटरी भी कमजोर हो रही थी। घुप्प अंधेरे में अलाव और ग्रामीणों के किसान टार्च से काम चलाना पड़ा। हाथी जब करीब आते दिखते तो उनसे बचने के लिए कभी-इधर तो कभी उधर दौड़ते -भागते रहे। जान में जान तब आई जब आधी रात के बाद हाथी वापस लौटे। जोखिम भरे हालातों के बीच दैवयोग से सभी सुरक्षित हैं।वन विभाग की बड़ी लापरवाही उजागर हैरानी की बात यह है कि हाथियों के इतने बड़े दल की मौजूदगी के बावजूद मौके पर निगरानी के लिए वन विभाग का एक भी अधिकारी या कर्मचारी तैनात नहीं था। हाथियों की निगरानी के लिए कोई ‘एलिफेंट स्क्वॉड’ मौजूद नहीं था। सुरक्षा के लिहाज से रास्ते को पहले ही बंद या डायवर्ट नहीं किया गया था। पण्डो-कोरवा विशेष संरक्षित जनजाति परिवारों की सुरक्षा पर भी सवाल उठा है। यह पूरा क्षेत्र इनका निवास स्थान है। हाथियों के इतने बड़े दल के बीच ग्रामीणों को उनके हाल पर छोड़ देना,कोई भी संसाधन नहीं देना, शाम होने से पहले खुद ही लौट जाना वन विभाग, हाथी मित्र दल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। साथ ही हाथी- मानव द्वंद्व रोकने के नाम पर किए जा रहे दिखावे, हाथी प्रभावित इलाकों में आवश्यक सामग्री टॉर्च आदि बांटे जाने के नाम पर सरकारी धन के बन्दरबांट की भी पोल खोलता है। सवाल कायम है कि यदि कल रात कोई अप्रिय घटना घटती, तो इसका जिम्मेदार कौन होता?
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