अपोलो अस्पताल की बड़ी लापरवाही: 3 महीने से दोनों एम्बुलेंस खराब, गंभीर मरीज को बिना मेडिकल स्टाफ के एयरपोर्ट भेजा; कांग्रेस ने घेरा
बिलासपुर के अपोलो अस्पताल की आपातकालीन व्यवस्थाओं की एक बार फिर पोल खुल गई है। एक गंभीर मरीज को हायर सेंटर रेफर करने के दौरान अस्पताल प्रबंधन की बेहद संवेदनहीन और गैर-जिम्मेदाराना कार्यप्रणाली सामने आई है। अस्पताल की दोनों एम्बुलेंस पिछले तीन महीने से कबाड़ होकर खड़ी हैं और इतने बड़े अस्पताल में बैकअप के तौर पर कोई वैकल्पिक व्यवस्था तक नहीं की गई है। हद तो तब हो गई जब मरीज को एयरलिफ्ट करने के लिए चकरभाठा एयरपोर्ट ले जाना था, तो अपोलो प्रबंधन ने अपना कोई भी डॉक्टर, नर्स या मेडिकल स्टाफ साथ भेजने से साफ इनकार कर दिया। प्रबंधन ने इसे अपनी आंतरिक नीति बताते हुए परिजनों को खुद प्राइवेट एम्बुलेंस का इंतजाम करने को कह दिया। कांग्रेस नेताओं ने दी उग्र आंदोलन की चेतावनी इस लापरवाही को गंभीरता से लेते हुए शहर कांग्रेस अध्यक्ष सिद्धांत मिश्रा, पूर्व विधायक शैलेश पांडेय, पूर्व अध्यक्ष विजय केशरवानी, विजय पांडेय, राजेश पांडेय, प्रमोद नायक और समीर अहमद के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल अपोलो अस्पताल पहुंचा। अस्पताल के सीईओ के न मिलने पर जब प्रतिनिधिमंडल ने मेडिकल सुपरिटेंडेंट (MS) से सवाल पूछे, तो जवाब सुनकर सब दंग रह गए। एमएस ने स्वीकार किया कि तीन महीने से एम्बुलेंस खराब हैं, लेकिन वैकल्पिक व्यवस्था पर उनके पास कोई ठोस जवाब नहीं था। जब गंभीर मरीज के साथ मेडिकल स्टाफ न भेजने पर सवाल किया गया, तो एमएस ने दलील दी कि "अस्पताल के स्टाफ को निजी एम्बुलेंस में नहीं भेजा जा सकता, यह नियम के खिलाफ है।" इस पर कांग्रेस नेताओं ने आक्रोश जताते हुए कहा, "बिलासपुर का दाना-पानी खाते-पीते हो, थोड़ा तो शर्म करो। प्रबंधन यह बताए कि मरीज की जान कीमती है या अस्पताल का नियम?" कांग्रेस ने चेतावनी दी है कि अगर व्यवस्था नहीं सुधरी तो उग्र आंदोलन किया जाएगा। यह है पूरा मामला (क्या हुआ था मरीज के साथ?): मरीज की स्थिति: पीडब्ल्यूडी (PWD) में पदस्थ राजकुमार अग्रवाल द्विपक्षीय निमोनिया (Bilateral Pneumonia), एच1एन1 (H1N1) संक्रमण, श्वसन विफलता (Respiratory Failure) और उच्च रक्तचाप से जूझ रहे थे। हायर सेंटर रेफर: बुधवार दोपहर डॉक्टरों ने उन्हें हायर सेंटर रेफर करने की सलाह दी। परिजनों ने आनन-फानन में 13 लाख रुपए खर्च कर हैदराबाद के यशोदा अस्पताल के लिए एयर एम्बुलेंस बुक की, जो समय पर चकरभाठा एयरपोर्ट पहुंच गई। रास्ते में घटी घटना: वेंटिलेटर और निरंतर निगरानी की आवश्यकता वाले इस गंभीर मरीज को अपोलो प्रबंधन ने बिना किसी डॉक्टर या मेडिकल स्टाफ के एक निजी एम्बुलेंस के भरोसे छोड़ दिया। इसका भयावह नतीजा यह हुआ कि एयरपोर्ट पहुंचते-पहुंचते मरीज का ऑक्सीजन लेवल गिरकर 20-22% तक रह गया। लाखों का अतिरिक्त नुकसान: स्थिति की गंभीरता को देखते हुए हैदराबाद से आई एयर एम्बुलेंस की मेडिकल टीम ने मरीज को ले जाने से मना कर दिया। मरीज को वापस अपोलो अस्पताल लाना पड़ा, जिससे परिजनों को अतिरिक्त 2 लाख रुपए ऑक्सीजन खर्च के रूप में भुगतने पड़े। कांग्रेस ने इन बिंदुओं पर मांगा जवाब (अल्टीमेटम): कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल ने अस्पताल प्रशासन को अल्टीमेटम दिया है कि 17 जुलाई को अस्पताल के सीईओ खुद सामने आकर इन सवालों के जवाब दें: तीन महीने से एम्बुलेंस खराब होने पर भी वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई? गंभीर मरीज के साथ मेडिकल स्टाफ न भेजने की जिम्मेदारी किसकी है? परिजनों के नुकसान की भरपाई कौन करेगा? आयुष्मान कार्डधारियों को उनके हक से वंचित क्यों रखा जा रहा है? कहा- अपोलो का विवादों से पुराना नाता कांग्रेस ने अस्पताल के पुराने मामलों को खंगालते हुए कहा कि अपोलो का विवादों से पुराना नाता रहा है। हाल ही में सामने आए कथित फर्जी कार्डियोलॉजिस्ट प्रकरण में डॉक्टर समेत अपोलो प्रबंधन के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो चुकी है। वहीं पूर्व मंत्री स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद शुक्ला के भी इलाज की व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे थे। इसके अलावा, सरकार की महत्वाकांक्षी आयुष्मान कार्ड योजना के तहत आने वाले गरीब मरीजों को इलाज न देने और उन्हें परेशान करने की लगातार आ रही शिकायतें अस्पताल की संवेदनशीलता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती हैं।
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