तहसील कार्यालय में ‘डायवर्सन खेल’ का बड़ा खुलासा! दलालों के प्रकरण फास्ट ट्रैक, आम जनता की फाइलें धूल खा रहीं?
बिलासपुर। जिले के तहसील कार्यालय में इन दिनों जमीन डायवर्सन प्रकरणों को लेकर एक अलग ही “खेल” चर्चा का विषय बना हुआ है। आरोप है कि कार्यालय में नियम-कायदों को ताक पर रखकर चुनिंदा प्रकरणों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि सामान्य नागरिकों और विभागीय माध्यम से आने वाले मामलों को अनदेखा किया जा रहा है। पूरे मामले में जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। सूत्रों के अनुसार, डायवर्सन मामलों में निर्धारित प्रक्रिया के तहत सामान्यतः 15 से 16 दिनों के भीतर आदेश जारी करने की व्यवस्था है। लेकिन तहसील कार्यालय में स्थिति इससे बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है। आरोप है कि विभागीय माध्यम से आरआई (राजस्व निरीक्षक) द्वारा भेजे गए प्रकरण समय सीमा के भीतर निपट नहीं रहे हैं। कई मामले अपलोड के इंतजार में फाइलों में दबे पड़े हैं, जिससे संबंधित पक्षकारों और विभागीय कर्मचारियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।बताया जा रहा है कि कार्यालय में अपलोड की जिम्मेदारी संभालने वाले रीडर द्वारा चयनात्मक तरीके से कार्य किया जा रहा है। चर्चा का विषय यह भी बना हुआ है कि संबंधित अपलोड प्रक्रिया से जुड़े रीडर के परिवार के सदस्य कथित रूप से बाहरी माध्यमों से डायवर्सन प्रकरण लाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि वे कार्यालय परिसर में बैठकर संबंधित प्रकरणों को अपलोड करवाते हैं और उन्हीं मामलों को प्राथमिकता के आधार पर समय सीमा से पहले निपटाया जा रहा है। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह न केवल हितों के टकराव (Conflict of Interest) का मामला हो सकता है, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। चर्चा है कि बाहरी माध्यमों से आने वाले कुछ डायवर्सन प्रकरणों को तत्काल अपलोड किया जाता है और उन पर तेजी से कार्रवाई भी होती है। इतना ही नहीं, ऐसे मामलों में समय सीमा समाप्त होने से पहले ही आदेश तक जारी होने की बात कही जा रही है। सबसे गंभीर आरोप यह है कि कथित दलालों अथवा प्रभावशाली माध्यमों से लाए गए प्रकरणों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि सामान्य आवेदक और विभागीय प्रतिवेदन उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। यदि ये आरोप सही हैं तो यह न केवल प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है, बल्कि पारदर्शिता और निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। यहां बड़ा प्रश्न यह है कि क्या संबंधित जिम्मेदार अधिकारी इन गतिविधियों से अनजान हैं? या फिर सब कुछ जानकारी में होने के बावजूद संरक्षण दिया जा रहा है? यदि कार्यालय के भीतर ऐसा कोई तंत्र सक्रिय है, तो यह पूरे राजस्व तंत्र की विश्वसनीयता पर चोट है। अब जरूरत इस बात की है कि जिला प्रशासन और कलेक्टर स्तर पर इस मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए। यह भी जांच हो कि किन प्रकरणों का समय पर अपलोड हुआ, किनका नहीं हुआ और किन मामलों में असामान्य तेजी दिखाई गई। सवाल जो जवाब मांग रहे हैं… क्या डायवर्सन प्रकरणों में दोहरी कार्यप्रणाली अपनाई जा रही है? क्या दलालों के माध्यम से आने वाली फाइलों को विशेष प्राथमिकता मिल रही है? सामान्य नागरिकों के आवेदन आखिर क्यों अटक रहे हैं? क्या जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी किसी बड़े संरक्षण की ओर इशारा कर रही है? अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं कि वह इस कथित “डायवर्सन खेल” पर कार्रवाई करता है या फिर यह खेल यूं ही चलता रहेगा।
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