चमका मंच, गूंजी मांगें... लेकिन ग्राहक की आवाज़ रही फीकी!
बिलासपुर के सराफा महासम्मेलन 2026 पर एक नजर बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में आयोजित सराफा महासम्मेलन-2026 भव्यता, भीड़ और व्यापारिक एकजुटता का बड़ा प्रदर्शन बनकर सामने आया। पूरा आयोजन ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो शहर का पूरा सराफा बाजार एक ही छत के नीचे सिमट आया हो। मंच पर प्रदेशभर के पदाधिकारी, जनप्रतिनिधि और व्यापारी मौजूद थे, जबकि हजारों की संख्या में सराफा व्यवसायी सम्मेलन में शामिल हुए। प्रदेश अध्यक्ष कमल सोनी ने अपने संबोधन में पारंपरिक सराफा व्यवसाय को नई दिशा देने की बात कही और स्वर्णकला बोर्ड के गठन की जोरदार मांग उठाई। इस प्रस्ताव का सभागार में जोरदार समर्थन हुआ और व्यापारियों ने तालियों की गड़गड़ाहट से अपनी सहमति जताई। सम्मेलन में व्यापारियों की सुरक्षा, कर व्यवस्था, कारोबार विस्तार, व्यवसायिक हितों की रक्षा और सरकारी स्तर पर सहयोग जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। मंच से बार-बार यह संदेश दिया गया कि सराफा व्यापार को अधिक सुरक्षित, संगठित और सशक्त बनाया जाना चाहिए। लेकिन इसी भव्य आयोजन के बीच एक सवाल भी चर्चा का विषय बन गया—क्या इस पूरे सम्मेलन में ग्राहक कहीं पीछे छूट गया? व्यापारिक मांगों के बीच हॉलमार्किंग की सख्ती, आभूषणों की शुद्धता की गारंटी, पारदर्शी बिलिंग, नकली आभूषणों पर रोक, प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था और ग्राहक जागरूकता जैसे उपभोक्ता हितों के मुद्दे अपेक्षित प्रमुखता से सामने नहीं आए। सराफा कारोबार की सबसे बड़ी पूंजी ग्राहक का विश्वास होता है। ग्राहक केवल सोना-चांदी नहीं खरीदता, बल्कि अपनी वर्षों की मेहनत की कमाई को भरोसे के साथ निवेश करता है। ऐसे में इतने बड़े सम्मेलन से यह अपेक्षा भी स्वाभाविक थी कि व्यापारिक मांगों के साथ-साथ उपभोक्ता हितों और जवाबदेही पर भी उतना ही गंभीर विमर्श होता। राजनीतिक और कारोबारी हलकों में इस सम्मेलन को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही है। कोई इसे व्यापारियों की एकजुटता का प्रतीक मान रहा है तो कोई इसे सरकार तक अपनी मांगें पहुंचाने का प्रभावी मंच बता रहा है। हालांकि आम उपभोक्ता के नजरिए से तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है—मंच की चमक, भाषणों का उत्साह और मांगों की गूंज तो खूब सुनाई दी, लेकिन ग्राहक हितों की आवाज़ अपेक्षाकृत धीमी नजर आई। अब यह देखना होगा कि भविष्य में ऐसे सम्मेलन केवल व्यापारिक मांगों तक सीमित रहते हैं या फिर उनमें उपभोक्ता अधिकार, पारदर्शिता और जवाबदेही को भी समान महत्व मिलता है। क्योंकि सराफा कारोबार की असली चमक केवल सोने-चांदी में नहीं, बल्कि ग्राहकों के विश्वास में छिपी होती है।
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