201 दिन से तपती धूप में अपने आशियाने बचाने की जंग, लेकिन न प्रशासन सुन रहा न जनप्रतिनिधि
45 डिग्री की भीषण गर्मी में 95 वर्षीय बुजुर्ग महिला सहित सैकड़ों लोग आंदोलनरत, क्षेत्रीय विधायक एक दिन भी हालचाल जानने नहीं पहुंचे बिलासपुर। लिंगियाडीह बचाओ आंदोलन ने बुधवार को अपने 201 दिन पूरे कर लिए, लेकिन इतने लंबे समय के बाद भी प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की ओर से कोई ठोस पहल नहीं होने से आंदोलनकारियों में भारी नाराजगी और निराशा देखी जा रही है। आंदोलन स्थल पर रोजाना ऐसे दृश्य देखने को मिल रहे हैं जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को सोचने पर मजबूर कर सकते हैं। जहां एक ओर 45 डिग्री की भीषण गर्मी से बचने के लिए लोग अपने घरों में एसी और कूलर का सहारा ले रहे हैं, वहीं दूसरी ओर लिंगियाडीह के गरीब परिवार केवल एक तिरपाल के नीचे बैठकर अपने घरों और भविष्य को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। सबसे मार्मिक दृश्य यह है कि आंदोलन में 95 वर्ष तक की बुजुर्ग महिलाएं भी शामिल हो रही हैं। कई महिलाओं को चिकित्सकों ने उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुए घर पर आराम करने की सलाह दी है, इसके बावजूद वे अपने आशियाने को बचाने की उम्मीद लेकर रोज आंदोलन स्थल पर पहुंच रही हैं। इन महिलाओं में कई ऐसी हैं जो दूसरों के घरों में झाड़ू-पोछा, बर्तन साफ करने और छोटे-मोटे मजदूरी कार्यों से अपना परिवार चलाती हैं। रोजी-रोटी की चिंता के बीच भी वे आंदोलन में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि यहां रहने वाले अनेक परिवार पिछले 40 से 50 वर्षों से इस क्षेत्र में निवास कर रहे हैं। उनकी कई पीढ़ियां यहीं पली-बढ़ी हैं। आज उनके नाती-पोते भी इसी बस्ती में अपना जीवन बिता रहे हैं। ऐसे में यदि उनके आशियानों को उजाड़कर वहां गार्डन, कॉम्प्लेक्स या अन्य परियोजनाएं बनाई जाती हैं, तो यह केवल मकानों का नहीं बल्कि पूरे जीवन संघर्ष, यादों और सामाजिक अस्तित्व का विस्थापन होगा। आंदोलनकारियों का आरोप है कि 201 दिनों के लंबे संघर्ष के बावजूद क्षेत्रीय विधायक एक दिन भी आंदोलन स्थल पर लोगों का हालचाल जानने नहीं पहुंचे। वहीं प्रशासन भी अब तक कोई ऐसा समाधान प्रस्तुत नहीं कर पाया है जिससे लोगों की आशंकाएं दूर हो सकें। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या विकास का अर्थ केवल भवन, गार्डन और कॉम्प्लेक्स बनाना है? यदि विकास की कीमत गरीबों के वर्षों पुराने आशियाने और उनके जीवनभर की कमाई से बने घरों को उजाड़कर चुकाई जाएगी, तो ऐसे विकास की संवेदनशीलता और औचित्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है। लिंगियाडीह के आंदोलनकारी आज भी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि प्रशासन और जनप्रतिनिधि उनकी पीड़ा को समझेंगे तथा ऐसा समाधान निकालेंगे जिसमें विकास भी हो और गरीब परिवारों के सिर से छत भी न छिने। लेकिन 201 दिन बाद भी जब कोई ठोस पहल दिखाई नहीं देती, तब आंदोलन स्थल पर बैठे बुजुर्गों की आंखों में एक ही प्रश्न दिखाई देता है—"क्या हमारी सुनने वाला कोई है?" "तपती धूप में बैठी इन झुर्रियों भरे चेहरों की लड़ाई सिर्फ मकानों की नहीं, बल्कि सम्मान, अस्तित्व और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की लड़ाई है।"
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