फर्जी हस्ताक्षर मामले में सिर्फ बेलतरा तबादला! SDM के दस्तखत की नकल के आरोप में ऑपरेटर पर FIR कब होगी?
सरकारी फाइलों में एसडीएम की सील और कथित फर्जी साइन का मामला, कार्रवाई के नाम पर महज पदस्थापना बदली—जांच और आपराधिक कार्रवाई पर उठे सवाल ....... बिलासपुर। सरकारी फाइलों में एसडीएम के कथित फर्जी हस्ताक्षर किए जाने का गंभीर मामला सामने आने के बाद भी संबंधित लोक सेवा ऑपरेटर पर अब तक केवल प्रशासनिक कार्रवाई किए जाने से सवाल खड़े हो रहे हैं। बिलासपुर तहसील में स्टेनो का काम संभाल रहे राकेश साहू को स्टेनो के कार्य से हटाकर अब नवीन सेवा सेतु केंद्र, बेलतरा तहसील में पदस्थ किया गया है। सवाल यह है कि यदि सरकारी दस्तावेजों पर अधिकारी के हस्ताक्षर की नकल कर दस्तावेज तैयार किए गए थे, तो क्या केवल तबादला ही पर्याप्त कार्रवाई है? लोक सेवा ऑपरेटर से स्टेनो तक का सफर जानकारी के मुताबिक राकेश साहू की नियुक्ति बिलासपुर तहसील में जाति, आय प्रमाण पत्र तथा लोक सेवा केंद्र से संबंधित कार्यों के लिए की गई थी। कर्मचारियों की कमी और कार्यालयीन व्यवस्था के चलते वह कथित रूप से तहसील के दूसरे कामों में भी सक्रिय हो गया और बाद में एसडीएम कार्यालय में स्टेनो का काम भी संभालने लगा। बताया जाता है कि पूर्व में उसका तबादला दूसरे स्थान पर किए जाने के बावजूद वह बिलासपुर तहसील में ही कार्य करता रहा। तबादला स्थल पर कार्यभार ग्रहण नहीं करने को लेकर जिला प्रबंधक की ओर से जवाब मांगे जाने पर भी मामला उच्च अधिकारियों तक फोन पहुंचने की चर्चाओं में रहा। सरकारी फाइल में सील और कथित फर्जी साइन का आरोप सबसे गंभीर आरोप यह है कि एसडीएम कार्यालय की सरकारी फाइलों में कार्यालय की सील लगाकर एसडीएम के हस्ताक्षर वाले स्थान पर कथित रूप से स्वयं हस्ताक्षर किए गए। यदि जांच में यह आरोप सही पाया जाता है तो मामला महज विभागीय अनुशासनहीनता का नहीं, बल्कि सरकारी दस्तावेजों की कूटरचना और उनका इस्तेमाल करने जैसे गंभीर आपराधिक कृत्य का बन सकता है। मामला सामने आने के बाद इसे मीडिया में भी प्रमुखता से उठाया गया था। इसके बाद बिलासपुर एसडीएम मनीष साहू द्वारा राकेश साहू को स्टेनो के कार्य से हटा दिया गया। अब उसे बेलतरा के नवीन सेवा सेतु केंद्र में पदस्थ किए जाने से यह सवाल फिर खड़ा हो गया है कि क्या स्थान बदलने से कथित फर्जीवाड़े की जांच भी खत्म हो जाएगी? नियमों के मुताबिक क्या कार्रवाई बनती है? यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि किसी कर्मचारी/ऑपरेटर ने जानबूझकर किसी लोक सेवक के हस्ताक्षर की नकल की, सरकारी दस्तावेज में परिवर्तन या कूटरचना की और उस दस्तावेज का उपयोग सरकारी कार्य में किया, तो संबंधित तथ्यों के आधार पर भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की कूटरचना, जालसाजी तथा जाली दस्तावेज के इस्तेमाल से संबंधित धाराओं में आपराधिक प्रकरण दर्ज किए जाने का प्रश्न उठता है। साथ ही विभागीय स्तर पर भी संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध विभागीय जांच, सेवा से पृथक्करण/अनुबंध समाप्ति तथा अन्य अनुशासनात्मक कार्रवाई पर विचार किया जाना चाहिए—बशर्ते जांच में आरोप प्रमाणित हों। **सबसे बड़ा सवाल—FIR क्यों नहीं? **अगर सरकारी फाइलों में एसडीएम के फर्जी हस्ताक्षर किए जाने के ठोस प्रमाण मौजूद हैं, तो प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि— **फर्जी हस्ताक्षर वाली फाइलें कितनी हैं? **किन-किन सरकारी आदेशों/दस्तावेजों पर कथित फर्जी हस्ताक्षर किए गए? **उन दस्तावेजों से किसी व्यक्ति को कोई लाभ मिला या नहीं? **मूल फाइल और डिजिटल रिकॉर्ड की जांच कराई गई या नहीं? **हस्ताक्षर की फॉरेंसिक/हस्तलेख विशेषज्ञ से जांच कराई गई या नहीं? **कथित फर्जी हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध पुलिस में शिकायत या FIR दर्ज कराई गई या नहीं? **यदि FIR नहीं हुई तो इसका कारण क्या है? **मामले में संबंधित अधिकारियों और कार्यालयीन कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच की गई या नहीं? **तबादला कार्रवाई है या मामले को ठंडे बस्ते में डालने का रास्ता? किसी सरकारी दस्तावेज पर अधिकारी के हस्ताक्षर की नकल करने का आरोप सामान्य कार्यालयीन गलती नहीं माना जा सकता। यदि आरोप सही है तो इससे सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता और प्रशासनिक व्यवस्था दोनों पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। ऐसे में बेलतरा पदस्थापना को अंतिम कार्रवाई मानने के बजाय पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच, संदिग्ध दस्तावेजों की फॉरेंसिक जांच और दोष सिद्ध होने पर आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाना आवश्यक है। अब निगाहें जिला प्रशासन और पुलिस पर हैं कि क्या कथित फर्जी हस्ताक्षर मामले में सिर्फ तबादले की कार्रवाई होगी या फिर जिम्मेदारी तय करते हुए FIR और विभागीय कार्रवाई भी की जाएगी?
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