सर्पदंश मुआवजा घोटाला: क्या पूरे सिस्टम में हुई चूक या था संगठित फर्जीवाड़ा?

एफआईआर, पोस्टमार्टम, सिम्स की चिकित्सीय प्रक्रिया, राजस्व जांच और प्रशासनिक स्वीकृति—हर कड़ी पर उठ रहे सवाल। 14 एफआईआर, 17 संदिग्ध प्रकरण, करोड़ों के मुआवजे पर सवाल—क्या केवल निचले कर्मचारी ही जिम्मेदार या फिर पूरी प्रशासनिक श्रृंखला होगी कठघरे में? बिलासपुर। जिले में सामने आए कथित सर्पदंश मुआवजा फर्जीवाड़े ने पूरे प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। मामला अब केवल फर्जी दस्तावेजों या कुछ कर्मचारियों तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि यह सवाल उठ रहा है कि थाना से लेकर कलेक्टर कार्यालय तक की बहु-स्तरीय प्रक्रिया के बावजूद कथित रूप से फर्जी दावों को स्वीकृति कैसे मिल गई। नियमों के अनुसार सर्पदंश से मृत्यु के बाद मुआवजा स्वीकृत होने से पहले एफआईआर, पंचनामा, पोस्टमार्टम, चिकित्सकीय परीक्षण, राजस्व जांच, पटवारी की रिपोर्ट, राजस्व निरीक्षक का परीक्षण, तहसीलदार की जांच, एसडीएम की अनुशंसा और अंततः कलेक्टर स्तर से स्वीकृति जैसी कई अनिवार्य प्रक्रियाएं पूरी होती हैं। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि यदि दस्तावेज फर्जी थे तो उन्हें किसी भी स्तर पर चिन्हित क्यों नहीं किया गया? अब तक की जांच में सार्वजनिक रूप से सामने आए प्रकरणों में शिवकुमारी यादव, सुनीता बाई सोनवानी, संतोष कुमार, कुंती बाई प्रजापति, केशव कुमार कश्यप, सफीना बानो, भगत सिंह ठाकुर, बहोरन लाल जायसवाल, शंकर साहू, अशोक कुमार, शशि पाठक, राजू कुमार, निर्मला धृतलहरे, मनसुख लाल साहू, रामनारायण कैवर्त, लक्ष्मीन कुर्रे तथा उर्वशी श्रीवास के मामलों की जांच की गई है। जांच के दौरान सामने आए दस्तावेजों और सार्वजनिक रिपोर्टों में मुकेश देवांगन, शेषनारायण जायसवाल, अतुल वैष्णव, गरिमा ठाकुर तथा प्रकृति ध्रुव के नाम भी विभिन्न प्रकरणों के संदर्भ में सामने आए हैं। इनकी भूमिका की जांच संबंधित एजेंसियों द्वारा की जा रही है। इन मामलों में अंतिम निष्कर्ष न्यायिक एवं विवेचना प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा। जांच की आंच अब सिम्स तक पहुंच चुकी है। पुलिस ने पूर्व सिम्स चिकित्सक डॉ. प्रियंका सोनी को इस मामले में गिरफ्तार किया है। पुलिस का आरोप है कि कुछ मामलों में पोस्टमार्टम रिपोर्ट और मृत्यु के कारण से जुड़े दस्तावेजों में कथित अनियमितताओं की जांच के दौरान उनकी भूमिका सामने आई है। वहीं पुलिस के अनुसार मामले में एक अन्य डॉक्टर की भी तलाश जारी है, जिसकी भूमिका की जांच की जा रही है। जांच एजेंसियां यह भी पड़ताल कर रही हैं कि कथित फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट, राजस्व अभिलेख और मुआवजा स्वीकृति की प्रक्रिया में किन-किन लोगों की क्या भूमिका रही। प्रशासनिक हलकों में चर्चा इस बात की भी है कि यदि फाइलें कई स्तरों से होकर गुजरीं, तो जवाबदेही केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक क्यों सीमित रहे? क्या उन सभी अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होगी जिन्होंने संबंधित फाइलों का परीक्षण किया, अनुशंसा दी अथवा स्वीकृति प्रक्रिया में भाग लिया? उठ रहे बड़े सवाल **क्या फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सरकारी मुआवजा स्वीकृत हुआ? **क्या राजस्व एवं चिकित्सकीय जांच केवल औपचारिकता बनकर रह गई? **कलेक्टर कार्यालय तक पहुंची फाइलों की जवाबदेही किसकी है? **क्या संबंधित तहसीलदारों, एसडीएम और अन्य सक्षम अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होगी? **क्या राज्य सरकार इस पूरे मामले की एसआईटी अथवा किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराएगी? जनता की मांग जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और नागरिकों की मांग है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष, समयबद्ध और उच्चस्तरीय जांच कर दोषी पाए जाने वाले प्रत्येक अधिकारी, कर्मचारी अथवा अन्य संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध समान रूप से कठोर कार्रवाई की जाए, ताकि सरकारी व्यवस्था में जनता का विश्वास बना रहे।

Jul 22, 2026 - 11:52
Jul 22, 2026 - 11:57
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