बस्तर में मलेरिया की वापसी: 15 हजार पार हुए मरीज, स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप
**जगदलपुर।** बस्तर संभाग को मलेरिया मुक्त बनाने के लिए चलाए जा रहे अभियानों के बीच हालिया आंकड़ों ने स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ा दी है। इस वर्ष अब तक बस्तर संभाग में 15,934 मलेरिया पॉजिटिव मामले सामने आ चुके हैं, जो क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहे संक्रमण की ओर इशारा करते हैं। बस्तर के 3 जिलों में घने जंगल, दूर-दराज़ के ग्रामीण अंचल और स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचने में होने वाली देरी के कारण मलेरिया के मामले लगातार बिगड़ रहे हैं। सुदूर जंगलों में रहने वाले ग्रामीणों और क्षेत्रों में तैनात सुरक्षा बलों के जवानों को इसका बड़ा असर झेलना पड़ता है। हालांकि, पहले की तुलना में स्थिति में कुछ सुधार हुआ है और 2015 के मुकाबले मलेरिया मामलों में 70% से अधिक की कमी आई है। एक समय बस्तर में सालाना 60 हजार से अधिक पॉजिटिव केस मिलते थे। लेकिन पिछले दो वर्षों में आंकड़े फिर बढ़े हैं—वर्ष 2024 में 4,496 मामले दर्ज हुए थे, जो 2025 में बढ़कर 16,544 हो गए और 2026 में अब तक 15,934 केस सामने आ चुके हैं। वर्ष-वार आंकड़ों की बात करें तो 2020 में 36,57,508 लोगों की जांच में 62,281 मरीज (1.70% दर), 2021 में 37,44,203 की जांच में 30,409 मरीज (0.81% दर), 2022 में 53,77,667 की जांच में 16,066 मरीज (0.30% दर), 2023 में 33,23,873 की जांच में 14,195 मरीज (0.43% दर), 2024 में 12,52,604 की जांच में 4,496 मरीज (0.36% दर), 2025 में 28,31,647 की जांच में 16,544 मरीज (0.58% दर) और 2026 में अब तक 22,29,558 लोगों की जांच में 15,934 मलेरिया पॉजिटिव मरीज (0.71% दर) पाए गए हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, रोगियों में **पी. फाल्सीपेरम (*P. falciparum*)** और **पी. वाइवैक्स (*P. vivax*)** दोनों प्रकार के परजीवी एक साथ मिल रहे हैं। यह 'मिक्स मलेरिया' सामान्य मलेरिया की तुलना में अत्यधिक खतरनाक और जानलेवा हो सकता है। इससे पीड़ित मरीजों में तेज बुखार, ठंड लगना, सिरदर्द, उल्टी, कमजोरी और भूख न लगना जैसी समस्याएं होती हैं। समय पर इलाज न मिलने पर यह बीमारी दिमाग, किडनी और लिवर पर गंभीर असर डाल सकती है तथा पी. वाइवैक्स के कारण संक्रमण बार-बार लौटने का खतरा बना रहता है। स्वास्थ्य विभाग बस्तर संभाग के संयुक्त संचालक डॉ. महेश सांडिया ने संभाग के सभी जिलों के स्वास्थ्य अमले को कड़े निर्देश दिए हैं कि ग्रामीणों को जागरूक किया जाए ताकि वे बुखार आने पर झाड़-फूंक कराने के बजाय सीधे निकटतम स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे। कठिन परिस्थितियों और दुर्गम क्षेत्रों के बावजूद स्वास्थ्य कार्यकर्ता ग्रामीण अंचलों में जोखिम उठाकर मरीजों की जांच और इलाज कर रहे हैं।
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